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देशप्रेम से बढ़कर जग में कोई प्रेम ना होता है

                
                                                         
                            हालांकि कोई उम्मीद नहीं थी फिर भी नींद ना आई।।
                                                                 
                            
इसी बात ने मुझको पूरी रात थी कभी सताई।।
मैंने सोचा प्रेम कहीं मुझको भी है हो आई।।
इसी बात ने भीतर भीतर मुझको बहुत डराई।।

किंतु ज्यादा देर तलक यह मुझे डरा ना पाई।।
जान गया जल्दी ही क्यों मुझको थी नींद ना आएई।।
चॉकलेट खाने का आदि मैं जो बना हुआ था।।
उसी के कारण ऑक्सीटॉसिन कैमिकल रिलीज हुआ था।।

नींद ना आने का कारण कैमिकल यही बना था।।
और यही सच्चाई है मुझको ना प्यार हुआ था।।
आए यहां तक तो थोड़ा-सा आगे और बढ़ते हैं।।
और प्रेम दुनिया की जाकर पूरी सैर करते हैं।।

काम वासना पूर्ति हेतु प्रेम यहां करते हैं सब।।
वरना कबिरा जैसी भक्ति कौन यहां करते हैं अब।।
प्रेम भंवर में जो भी फंसता फंसता चला ही जाता है।।
लाख कोशिशे कर ले पर फिर भी वह निकल ना पाता है।।

सच्चाई तो यह है कि यह बर्बादी ही लाएगी।।
किंतु बात समझ यह बर्बादी के बाद ही आएगी।।
प्रेम नहीं वह युवा पीढी ने जो कुछ भी समझाया है ।।
देह दिखावे के चक्कर में ज्यों खुद को उलझाया है।।

जो भी राह मनुजता धरता धीरज कभी ना खोता है।।
देशप्रेम से बढकर जग में कोई प्रेम ना होता है।।

अनुभव झा


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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