आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नारी ,नव नव रूप

                
                                                         
                            गिरी से ऊंचा हौसला ,
                                                                 
                            
गहराईयां समंदर सी ...
मासूम सी तस्वीर कभी,
कभी प्रेम से आलोरती ..
समुद्र की चंचल लहरों सी ,
तपन में शीतल चंद्र सी ..
हर रूप तेरा अद्भुत है ,
हर तिमिर में आलोक सी ..
भावों की इस असीमता को ,
कौन जान सकता है यहां...
हर रिश्ते के किरदार को ,
कौन यूं निभा सकता भला ..
लक्ष्मीबाई सा हौसला तो ,
पन्ना सी ममताभरी ..
पद्मावती सी त्याग निडरता,
मीरा प्रेम से हुंकारती..
प्रेम है तू प्यार है तू ,
दुनिया ने समझा कहा ..
इस सृष्टि की धुरी बनने,
ईश्वर ने तुझको गढ़ा...
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर