इन पहाड़ों पर अब धूप है छाँव तक आती नहीं है,
अब हवाओं से क्या गिला तेरी खुशबू लेकर आती नहीं है..
इतना अकेला रहता हूँ कमरे में रौशनी आती नहीं है,
कितना भी जोर से पुकारू तुझ तक आवाज जाती नहीं हैं..
वो कितना भी नाराज हो उसकी कसमें खाते नहीं हैं,
ज़िन्दगी शायद ख़तम हो गई पर मौत भी आती नहीं है..
साथ रहती है जब भी नजरे चुराती नहीं है,
गुस्सा मैं कितना भी रहूं दूर मुझसे जाती नहीं है..
अक्सर देर रातों को उसे नींद नहीं आती,
कैसे जीतेगी अकेले, मेरे बिना वो कहीं जाती नहीं है..
–Phantom
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