चार दिन की जिंदगी में,
काहे का है इतना गुरूर।
जो आज है वो कल नहीं रहेगा,
यही है दुनिया का दस्तूर।।
अपने स्वार्थ के लिए,
मत बनो इतना क्रूर।
आदमी जीवन के सफर में,
कभी न कभी होता है मजबूर।।
दौलत के लोभ में,
मत बनो इतना मजबूर।
लालच के अंधी दौड़ में,
कहीं लुट न जाए कोई बेकसूर।।
कामना के नशे में,
जो होता है सुरूर।
एक दिन वही,
अपनों से कर देता है दूर।।
क्रोध के आवेश में,
मन को मत बनाओ तंदूर।
यही रिश्ते को,
कर देता है चकनाचूर।।
चार दिन की जिंदगी में,
काहे का है इतना गुरूर।
जो आज है वो कल नहीं रहेगा,
यही है दुनिया का दस्तूर।।
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