एक ख्वाबों का क़ाफ़िला है तू
ज़िंदगी एक सिलसिला है तू
बेदिली और कुछ नहीं है पर
मेरी लग़्ज़िश का ही सिला है तू
हां तू आगोश में तो है लेकिन
मुझको अब भी कहां मिला है तू
मैने सोचा था प्यार है मेरा
पर मेरी जान एक गिला है तू
मेरे जज़्बात सारे मर हैं चुके
और हां इनकी क़ातिला है तू
एक ये बात बतला दे मुझको
क्या मेरे ग़म में मुब्तला है तू
(मुब्तला: ग्रसित/व्यस्त/दुखी)
ऐ गुल-ए-दिल खिला तो है अब हां
पर बड़ी देर से खिला है तू।
-अनमोल
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