आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

छुट्टी के दिन (नज़्म)

                
                                                         
                            सुना है छुट्टी के दिन अब आने वाले हैं
                                                                 
                            
नई उमंगें साथ में वो लाने वाले हैं

कल से देख रहा हूं नुक्कड़ पर
लगातार कुछ बसें आती हैं
साथ में अपने कितने चेहरे लाती हैं
उनमें कितने भाई, बहन, शौहर आते हैं
रिश्तों के कैसे-कैसे गौहर आते हैं
(गौहर: मोती)

ये सूना सा गांव कल से चहक रहा है
रिश्तों की खुशबू में कल से महक रहा है
कई गुज़िश्ता माह अकेलेपन में बीते
रिश्तों के खाली से सूनेपन में बीते
(गुज़िश्ता: पिछला)

अब देखो ये चेहरे कैसे चमक रहे हैं
कल से देखो कैसे ये सब चहक रहे हैं
मेरे दिल में भी एक आस ने घर किया है
इन चेहरों को देख कर ये दिल बोल रहा है
माना कि मशगूल हो तुम अपने धंधे में
गर्दन अपनी फँसा रखे हो इस फंदे में
फिर भी ये दिल कल से यही अब सोच रहा है
शायद इस छुट्टी में तुम भी घर आ जाओ।
-अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर