आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चाहत (नज़्म)

                
                                                         
                            कोई चाहत तो होती अपने दिल में
                                                                 
                            
कि ये चाहत भी अब दिल में नहीं है
कोई हसरत तो होती दिल में अपने
कि ये हसरत भी अब दिल में नहीं है

बस एक वीरानी सी वीरानी है अब
कोई अब रात न सुहानी है अब
न सुबह की कोई चाहत है दिल में
न अब कोई भी हसरत है दिल में

न चाहत है तुझे अब देखने की
और न मिलना तुझसे चाहता हूं
बस एक सवाल ख़ुद से कर रहा हूं
कि क्या मैं अब भी तुझको चाहता हूं

न जाने दिल में क्या-क्या चल रहा है
बेवजह दिल भी क्यों मचल रहा है।

- अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर