२०२३अगस्त में मैं गया में आया
इस पावन धरती का प्यार पाया
कवियों,साहित्यकारों का दुलार पाया
हिंदी साहित्य सम्मेलन में मैं आया
सुरेंद्र सिंह,सुमंतजी,का प्यार पाया
अरुणजी,परदेशी जी का दुलार पाया
सिद्धार्थ गौतम को इसने बुद्ध बनाया
आकर यहीं परम ज्ञान उन्होंने पाया
सारे संसार से लोग इस पावन धरा पर आते हैं
हिंदू आकर पितृपक्ष में पिंडदान करके जाते हैं
बौद्ध आकर जीवन अपना सफल बनाते हैं
इस पावन धरा पर हम अपना शीष झुकाते हैं
अंत: सलिला फल्गु जहां बहती है
मोक्षदायिनी गंगा से कुछ कहती है
हम इस पावन धरा पर प्यार पुष्प चढ़ाते हैं
पितृ पक्ष में लगता यहां मेला बड़ा भारी
गया की पावन धरती का हम हैं आभारी
गयासुर की पावन धरती
रही नहीं कभी परती
यहां से निकले खुशियाल सिंह व अनुग्रह नारायण
यहां से निकले जानकी बल्लभ,विष्णु देव नारायण
हंस कुमार,सहज कुमार की कर्म स्थली यही है
स्वर्ग से सुंदर, स्वर्ग से ऊंचा धर्म स्थली यही है
सुधा दायिनी,ज्ञान दायिनी जानती इसे मही है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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