कहां गया वो मौले श्री का पेड़?
कहां गया मेरा प्यारा राज दुलारा पेड़?
किसने काटा?
कब काटा?
क्यों काटा?
कितना दर्द हुआ होगा?
कितना रक्त बहा होगा?
पेड़ रोया होगा
पर कोई नहीं सुना होगा
उस प्यारे पेड़ की चीत्कार को
वैसे ही जैसे बेटियों के चीत्कार को
सुनती नहीं यह जालिम दुनिया
तोड़ती नहीं यह जालिम दुनिया
बनाती है अपने हवस का शिकार
क्या यही है हमारा संस्कार?
पूछ रही है मेरी कलम की धार
वह पेड़ मेरे दुःख सुख का साथी था
वह मेरे गांव घर का अच्छा साथी था।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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