आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अपने प्यारे हिंदुस्तान को छोड़कर

                
                                                         
                            अपने प्यारे हिंदुस्तान को छोड़कर
                                                                 
                            
अपने स्वर्ग सा देश से मुंह मोड़ कर
कहां जाऊं मैं?
क्यों जाऊं मैं?
स्वदेश का प्यार कहीं मिल नहीं सकता
स्वदेश प्यार का बीज अन्यत्र खिल नहीं सकता
मेरा गांव मेरा देश
मेरा गांव मेरा भेष
मेरी गंगा मां
मेरी भारत मां
विदेश में मिल नहीं पायेगा
दिल मेरा दो टुक हो नहीं पाएगा
विदेश में दिल मेरा आह भरते रह जाएगा
विदेश में दिल मेरा फट जाएगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
1 hour ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर