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मत बोओ घृणा के बीज

                
                                                         
                            घृणा,अहं के बीज बोए हमनें
                                                                 
                            
लोभ मोह के बीज बोए हमनें
अब आतंक की फसल काट रहे हैं
भला क्यों इंसान को हम बांट रहे हैं?
इस धरा पर मानव प्यार के बीज बोने थे
करूणा,सदाचार,उपकार के बीज बोने थे
इस पावन धरा पर मानव ममता के बीज बोने थे
इस पावन धरा पर मानव समता के बीज बोने थे
हम आज भी खिलौने हैं कल भी खिलौने थे
हम आज भी विचार से बौने हैं कल भी बौने थे।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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36 मिनट पहले

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