तूफानों से सदा टकराता हूं
मुश्किल में राह बनाता हूं
शत्रुओं को धूल चटाता हूं
एक आंख दिखाता हूं तो
शत्रुओं के छूटते हैं पसीने
दूसरी आंख दिखाता हूं तो
विद्रोहियों के छूटते पसीने
चुनौतियों से नित लड़ता हूं
हक पर अपने अड़ता हूं
है समंदर सा उताल भाल मेरा
है पर्वत सा ऊंचा भाल मेरा
देखो चमकता भाल मेरा
देखो दमकता भाल मेरा
मैं नित चुनौतियों को ललकारता हूं
भागते हैं शत्रु जब मैं हुंकारता हूं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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