मेरी लेखनी में अंगार है
मुझे स्वदेश से प्यार है
मेरी लेखनी में ललकार है
मेरी लेखनी में हुंकार है
अब अपना अक्साई चिन
चीन से लेना है छिन
कब तक रहेंगे हम दीन
हीन मलीन, खिन्न?
१९६२ में चूक गए थे हम
है अभी तक हमें उसका गम
पर अब हिंद के एक हुंकार
से हिल उठेगा सारा संसार
उतना आज हममें दम है
हम अब किसी से नहीं कम हैं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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