जीवन दो दिन के सपनों का बाजार है
जिंदगी में झगड़े रगड़े काट व मार है
मकान दुकान सामान सब साथ नहीं जाएगा
सब धरा का धरा,धरा पर ही रह जाएगा ।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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