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हे सिया तूने वो क्यों माँग लिया?

                
                                                         
                            हे सिया तूने वो क्यों माँग लिया,
                                                                 
                            
वह हिरण नहीं नाग था।
वह हमारे विरह की आग थी
तेरी माँग को जानकर भी
मैंने क्यों मान लिया।
जानते हुए भी न जाने
क्यों खुद को उसके पीछे जान दिया।

हे सीता, तू तो खुद लक्ष्मी थी,
तूने क्यों आम स्त्रियों की तरह व्यवहार दिखाया,
तूने क्यों काल विकराल दिखलाया।
नहीं मेरी ही गलती थी,
मैं जानता था कि स्वर्ण हिरण नहीं होते हैं,
तब भी मैंने मूर्खों सा स्वभाव दिखलाया।
तभी विधि ने हमें
यह विरह काल बतलाया।
हे सिया तू किधर है,
मैं कहाँ ढूढूँ तुझे,
क्या यहाँ कोई है
जो सिया का पता
बता सकता हो मुझे।
- अंकित किरार
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2 वर्ष पहले

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