मैं बेटी हूँ, पत्नी हूँ, माँ हूँ,
हाँ, मैं एक औरत हूँ
मैं सृष्टि की जननी हूँ।
पर क्या मेरी अपनी कोई पहचान है?
बेटी के रूप में मुझसे त्याग की अपेक्षा,
पत्नी के रूप में समर्पण की अपेक्षा,
माँ के रूप में ममता और जिम्मेदारियों की अपेक्षा
हर रिश्ते में मुझसे कुछ न कुछ माँगा जाता है।
लेकिन जब बात आती है
मेरे सपनों की, मेरी इच्छाओं की, मेरे अस्तित्व की
तो मेरी पहचान कहाँ है?
क्यों मेरी पहचान हमेशा किसी रिश्ते से जुड़ी हो?
क्यों मुझे यह साबित करना पड़े कि
मैं किसी की बेटी हूँ, किसी की पत्नी हूँ, किसी की माँ हूँ?
मैं सिर्फ रिश्ते निभाने के लिए पैदा नहीं हुई।
मैं स्वयं भी एक इंसान हूँ, एक व्यक्तित्व हूँ।
मेरे सपने हैं, मेरी इच्छाएँ हैं,
मेरी अपनी सोच है, मेरी अपनी आवाज़ है।
अब समय है कि औरत
सिर्फ दूसरों के लिए जीना नहीं,
अपने लिए जीना भी सीखे।
अपने अस्तित्व को पहचाने,
अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाए,
अपने सपनों को पंख दे
और अपनी पहचान खुद बनाए।
क्योंकि औरत की सबसे बड़ी पहचान
किसी की बेटी, पत्नी या माँ होना नहीं
बल्कि स्वयं “वह” होना है।
आइए, ऐसी दुनिया बनाएँ
जहाँ औरत को उसके रिश्तों से नहीं,
उसके व्यक्तित्व, उसके कर्म और उसकी पहचान से जाना जाए।
मैं औरत हूँ।
मैं किसी की परछाईं नहीं
मैं स्वयं एक पहचान हूँ।
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