तुम ख़यालों में गर…
तुम ख़यालों में गर आओ, तो ग़ज़ल हो जाए,
मेरी ख़ामोश मुहब्बत भी मुकम्मल हो जाए।
तेरी यादों की महक रूह में यूँ उतर आए,
हर इक एहसास मेरे दिल का मख़मल हो जाए।
तेरी आँखों में जो पढ़ लूँ मैं मुहब्बत की ज़बाँ,
मेरी ख़ामोशी का हर राज़ मुकम्मल हो जाए।
तेरी आहट से धड़क उठे ये तन्हा-सा दिल,
रात का दर्द भी इक ख़्वाब-ए-मुसलसल हो जाए।
तू जो छू ले कभी यादों की नर्म उँगली से,
ज़ख़्म-ए-दिल भी तेरे एहसास से मरहम हो जाए।
तेरी तस्वीर को रख लूँ जो मैं पलकों के तले,
मेरी वीरान-सी दुनिया भी महफ़िल हो जाए।
दूरियाँ चाहे रहें दरमियाँ उम्र भर की,
तेरी यादों से मगर रिश्ता न ओझल हो जाए।
मैंने चाहा है तुझे उम्र की ख़ामोशी में,
तू मिले तो मेरा हर ख़्वाब मुकम्मल हो जाए।
इश्क़ में तेरा फ़क़त नाम ही काफ़ी है मुझे,
ज़िंदगी का हर इक मौसम भी ग़ज़ल हो जाए।
तू न आए तो भी तेरा ही तसव्वुर हो साथ,
मेरी तन्हाई भी फिर मेरी हमदम हो जाए।
तुम ख़यालों में गर आओ कभी चुपके से मेरे,
‘अनु’ की ख़ामोश मुहब्बत भी मुकम्मल हो जाए।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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