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फिर मिलेंगे

                
                                                         
                            तुम चले गए हो सरहद पर,
                                                                 
                            
मैं यहीं तुम्हारी राह तकूँगी,
तुम देश की रक्षा करना,
मैं प्रेम की लौ जलाए रखूँगी।

आँखों में ठहरा यह सावन,
कब तक यूँ ही बरसेगा,
हर आहट पर मेरा मन
दरवाज़े तक जा ठहरेगा।

तुम्हारी वर्दी की सलवट में
मेरा सारा प्यार रहेगा,
मेरी हर धड़कन में बस
तुम्हारा ही इंतज़ार रहेगा।

तुम कहते हो—
“फ़र्ज़ पहले है…”
मैंने सिर झुकाकर मान लिया,
पर इस दिल ने चुपके से
तुमसे मिलने का स्वप्न बुन लिया।

राह कठिन हो, रात बड़ी हो,
तूफ़ानों का डर मत करना,
मेरी याद अगर आ जाए तो
आँखों को नम मत करना।

मैं हर शाम दिया जलाकर
तुम्हारी राह सजाऊँगी,
चाँद से तुम्हारी खबर पूछकर
फिर खुद ही मुस्काऊँगी।

दूरी चाहे लाख हो जाए,
प्रेम कहाँ कम होता है,
सच्चा प्रेम तो वह दीपक है
जो आँधी में भी रोशन होता है।

तुम जाओ…
देश तुम्हें पुकार रहा है,
मैं अपने आँचल में
तुम्हारा इंतज़ार सँभालूँगी।

बस जाते-जाते
इतना कह देना—
“यह बिछड़ना आख़िरी नहीं…”

मैं भी मुस्कुराकर कह दूँगी—
“जाओ… अपना फ़र्ज़ निभाओ,
मैं यहीं मिलूँगी—
और हाँ…
हम फिर मिलेंगे।” 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

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