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प्रेम, क्षमा और संवेदना से बुझता है।

                
                                                         
                            दावानल ~
                                                                 
                            

यह आग
केवल जंगल में नहीं लगती,
कभी-कभी
मन के भीतर भी
दावानल धधकता है।

सूखी लकड़ियों की तरह
कुछ पुराने रिश्ते,
कुछ अधूरे संवाद,
कुछ अनकहे शब्द
चुपचाप जमा होते रहते हैं—
और फिर
एक छोटी-सी चिंगारी
सब कुछ जला देती है।

शहरों में भी
दावानल है—
किसी की महत्वाकांक्षा में,
किसी की ईर्ष्या में,
किसी की आँखों में पलते
अंतहीन लालच में।

हम पेड़ों को बचाने के लिए
अभियान चलाते हैं,
लेकिन
मनुष्य के भीतर जल रहे जंगल को
कौन बचाए?

कितनी विचित्र बात है—
पेड़ जलते हैं
तो धुआँ दिखाई देता है,
मनुष्य जलता है
तो वह मुस्कुराता रहता है।

एक दिन
उसके भीतर का दावानल
इतना फैल जाता है
कि बचा नहीं रहता
न कोई हरापन,
न कोई छाँव,
न कोई पक्षी का गीत।

फिर वह पूछता है—
“आख़िर मेरे भीतर
इतना सन्नाटा कब उग आया?”

काश!
चिंगारी बनने से पहले
हम शब्दों को समझ लेते,
क्रोध बनने से पहले
मौन को पढ़ लेते,
और आग फैलने से पहले
एक बूँद संवेदना
रख देते।

क्योंकि
जंगल का दावानल
वर्षा बुझा सकती है,
पर मन का दावानल
केवल
प्रेम, क्षमा और संवेदना से बुझता है।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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