वन का पंछी कहता है
वन का पंछी कहता है—
आकाश गहरा नीला है,
उड़ने वाले पंखों के लिए
यह संसार खुला-खुला है।
न कोई सीमा राहों की,
न कोई बंधन डेरा है,
जिसने नभ को अपना माना,
उसका हर क्षण सवेरा है।
झरनों की निर्मल धारा में
मन अपना प्रतिबिंब निहारे,
पर्वत की चुप्पी में सुन ले
जीवन के अनकहे इशारे।
पंख मिले हैं उड़ने को तो
क्षितिजों से क्यों डरना है?
बादल चाहे राह रोक लें,
फिर भी आगे बढ़ना है।
नीला आकाश पुकार रहा—
“अपने सपनों को पंख लगाओ,
धरती की सीमाओं से आगे
अपना नया गगन बनाओ।”
वन का पंछी फिर मुस्काया,
पंख पसारे दूर चला—
आकाश गहरा नीला था,
और उसका मन भी नीला था।
नीले नभ की उस गहराई में
एक संदेश सुनाई देता है—
जो स्वयं पर विश्वास करे,
वही सच में आज़ाद जीता है।
- अनिता चतुर्वेदी
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