बैठकर मैं घर के उस कोना में, मैं खुद को देख रहा दूध पिला रही अम्मा, बहन लगा रही छाँडू एक तरफ पकवान की खुशबू, एक तरफ आंगन की महक
मैं उस कोना में बैठा, देख रहा दादी का प्यार
अब है उस कोने पे ,दादी की तस्वीर जिस पर चड्ढा है हार.
उसी कोने से देख रहा, भाई की पडते डंडे
आ रही है उस आंगन में बुआ मौसी मैं और मौसा.
मैं देख रहा उस कोने से, बहन को मिठाई चुराते
बसता फेका उसी कोने में , चला गया सखा-संग्राग करने
देर से आने पर पड़ती मार, फिर दनक जाता उसी कोने में ,
अब रहता कोने से दूरी पर रात्री कोने में ही जाती. अब ना ही है बहन और ना बहन का प्यार , और साथ भी छुट रहा है उस कोने का।
ऐ ववत जरा घिरे चल, बचपना की तरह जल्दी मत जा
जवानी जीनी है थोड़ी और उस कोने को बनाना है सुदंर
करनी है माता-पिता के सेवा, और भाई का आदर
लाना है उस प्रेमिका को और दिखाना है कोना
अब जाता नहीं उस कोने में, साथ छुट रहा धीरे-धीरे ॥ ए वक्त थोडा घिरे चल, अभी बाहुत जिना है उस कोने में ।।
-अनिष कुमार
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