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शिकायत इतनी न करो

                
                                                         
                            शिकायत इतनी न करो कि हम भूल जाएँ,
                                                                 
                            
वो कसमें, वो वादे टूट जाएँ।
हम तो आशिक़ हुआ करते थे,
पर बदनामी कर न पाए।

ये शराब ही मेरा आशिक़ निकला,
जो वफ़ा को मजबूर बना दिया।

हम तो ताश के पत्ते थे,
पर दरिया का किनारा तुमसे ही निकला।

हम तो मोहताज थे इस दुनिया के सफ़र में,
तुम ही तो साहिल का किनारा बनते गए,
हमसफ़र की तरह।

एक सुरूर ही तो था शराब में,
जो मुझे तुम्हारे होंठों तक ला देता था।

ये दुनिया इतनी गुमशुदा थी कि,
मुझे तुमसे जुदा कर देती थी।

पर क्या कहें, हम कह न सके,
तुम तमन्ना हो मेरी,
फ़ुर्सत का...

— अनिल शाह
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12 घंटे पहले

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