माँ, तुम मेरी सखी हो, तुम मेरी सहेली हो,
तुम मेरा दर्पण हो, तुम मेरी पहली हो।
बहुत सताती हो मुझसे दूर होकर,
पर तुम्हारी याद आती है रो-रोकर।
क्यों मुझे इतना ग़म सिखा जाती हो,
तुम कुछ क्यों नहीं बोल पाती हो?
खुद रूठकर मुझे मनाती हो,
माँ, तुम बहुत याद आती हो।
मैं भी तो तुम्हारी ही हूँ,
फिर किसी की बात पर क्यों नाराज़ हो जाती हो?
कितना दुःख देखा है आपने,
पर जब जताना था, तो जताया क्यों नहीं?
अपनी कोख में बसाया था मुझे,
अपनों से अपना बनाया था।
कितना दर्द सहा था तुमने,
फिर यह दुनिया दिखाया था।
तुमने मुझे डाँटा क्यों नहीं,
मेरी गलती पर मारा क्यों नहीं?
मैं तो तुम्हारी बस तुम्हारी ही हूँ।
पर मुझे हर पल याद आती हो,
दूर रखकर अपनी याद दिलाती हो।
तुम कुछ बोल क्यों नहीं पाती हो,
यूँ मुझसे दूर होकर मुझे रुलाती हो।
मुझे याद है, तुम कितना लड़ी हो,
खुद से नहीं, दुनिया से मेरे लिए झगड़ी हो।
प्यार इतना करती हो, पर दिखाती नहीं हो,
सच में, क्यों इतना सताती हो?
तुम्हें याद है वो दिन,
जब सूखी रोटी खाकर मुझे दूध पिलाती थी।
खुद भूखी रहकर मेरे सपनों की दुनिया बनाती थी।
माँ, तुम मेरी सखी हो,
तुम मेरी सहेली हो,
तुम मेरा दर्पण हो,
तुम मेरी पहली हो।
-अनिल शाह
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