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गुजर गई

                
                                                         
                            शाखों से गिरे पत्तों की तरह बिखर गई
                                                                 
                            
उजले हसीन चेहरे की तरह निखर गई
वो हाल हुआ है कि हुआ शोर हर तरफ
खामोश निगाहें तेरी क्या क्या न कर गई
रहती थी जो होठों पे तस्सुम की तरह से
रुत बदला तो अनजान हवा सी गुजर गई
ये इश्क चढ़ गई दिलों की हर बुलंदियां
उतरी भी तो नशे की तरह से उतर गई
कश्ती मेरी डूबी नहीं लहरों के कहर से
तूफान में लड़कर भी मुझे पार कर गई
तू गया शहर से तेरे एहसास रह गए
आया मुझे नजर जहां जहां नजर गई
लुट कर भी मोहब्बत में खुश तो है मुसाफिर
उजड़ा भी इस तरह की जिंदगी संवर गई
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4 घंटे पहले

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