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असरदार भी नहीं

                
                                                         
                            दिल को खराब करना सही बात भी नहीं
                                                                 
                            
काबू में रह पाते सदा जज्बात भी नहीं
वो भी थके बैठे हैं दौड़ते थे जब कभी
कोई नजर आता था आसपास भी नहीं
गुम हूं मैं इस खयाल में की तुम नहीं मिले
मशगूल हूं यूं खुद से मुलाकात भी नहीं
एहसास का ये जाल कितना दिलफरेब है
मालूम है इतना तू वफादार भी नहीं
मैं दूर आकर भी हूं किसी जादू के असर में
माना ही खुद को निकला समझदार भी नहीं
इस रोग का ईलाज अब खुद ही करेंगे हम
जो चलन में दवा है असरदार भी नहीं
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
19 मिनट पहले

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