सीने से मेरे निकला भी क्या क्या दबा हुआ
जी खोल कर जीने का मन जब भी बना लिया
रोना न हो तो कैसे न हो बात कितनी साफ है
शीशे का हो कर भी आदमी है पत्थर बना हुआ
मुझको भी मिलें मंज़िल कुछ अलहदा,बुलंद
रखता है ख्वाहिश आदमी राह में रुका हुआ
सूरज से उजाले की चाह थी उन्हें बेशक
बाती बिना चिराग़ है जिनका बुझा हुआ
आंखों को भा गया था जो कैसे बदल गया
यादों में मेरे ठहरा है वो मंजर रुका हुआ
रोता हुआ उसे मैं याद करता हूं अक्सर
रोए बिना,गुमसुम सा जो मुझसे जुदा हुआ
बरसात थी,जंगल था,और थी रात अंधेरी
जलती क्या आग बस समां धुआं धुआं हुआ
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X