मुझे गिराने में
कसर किसी ने न छोड़ी मुझे गिराने में
किसी ने हाथ बढ़ाया नहीं उठाने में।
उदासियों ने मुझे यूँ ही तो नहीं घेरा
सभी का हाथ है दिल को मिरे जलाने में।
ठहर ठहर के मिरी आँख नम हुई जाती
ख़ुशी हुई न किसी को मुझे हँसाने में।
तुम्हारे शहर का दस्तूर है अजब साहब
मज़ा सभी को है आता यहाँ रुलाने में।
यक़ीन किस पे किया जाए तू बता दे अनिल
हुनर सभी को है हासिल यहाँ सताने में।
-पंडित अनिल
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