*कविताओं का किसान*
मैं कविताओं का किसान,
मेरी कविता का मोल है क्या?
शब्दों की धरती जोती मैंने,
इनमें मेरा बोल है क्या?
धूप सहे, बरसातें झेलीं,
मन में बीज विचारों के बोए,
आँखों की नमी से सींचा,
सपनों के कुछ फूल सँजोए।
कागज़ मेरा खेत बना है,
कलम बनी हल की पहचान,
भावों की फसल उगाता हूँ,
बाँट रहा हूँ अपना ज्ञान।
मंडी में भाव नहीं मिलता,
फिर भी खेती छोड़ूँ कैसे?
मन की पीड़ा शब्द है बनती,
जीवन किधर मैं जोड़ूँ कैसे?
कोई पढ़कर मुस्का दे तो,
मेहनत मेरी धन हो जाती,
एक हृदय को भी छू जाए तो,
सारी दुनिया कम हो जाती।
मैं कविताओं का किसान हूँ,
मुझको धन की चाह नहीं,
शब्द बचें और भाव बचें बस,
इससे बढ़कर राह नहीं।
कल मेरी ये फसल किसी के
सूने मन में फूल खिला दे,
मेरी कलम की छोटी-सी धुन
किसी थके मन को सहला दे।
फिर पूछो मत मोल कविता का,
मोल कहाँ शब्दों का होता?
जिसके भीतर भाव अनिल हो,
वह जग में अनमोल है होता।
-पंडित अनिल
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