चाँदनी रात में सोलह शृंगार सजता है,
प्रेम का दीप लिए मन आँगन में बसता है।
करवा चौथ का व्रत है,अटूट विश्वास का,
सुहागिनी के नयनों में स्वप्न मधुमास का।
हाथों में मेहँदी रचे,चूड़ियाँ खनकती हैं,
पिया की मधुर यादें साँसों में महकती हैं।
पूजा की थाली में श्रद्धा के फूल खिले,
मन के मंदिर में प्रेम के दीपक जले।
चंदा से कहती है सजनी,दर्शन दिखा दो,
मेरे प्रियतम के जीवन में सुख बरसा दो।
छलनी से निहारूँ मैं चाँद और पिया को,
समर्पण की डोर बाँधूँ अपने प्रियतम जिया को।
यह व्रत न केवल रीति,प्रेम की कहानी है,
दो हृदयों के मिलन की पावन निशानी है।
सुख-दुःख में साथ रहें, यही प्रार्थना हमारी,
प्रेम से महके सदा गृहस्थी की फुलवारी।
- पंडित अनिल
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