चौखट पर ठहरी हुई साँझ का आना,
खिड़की से चुपके से चाँद का मुस्काना,
सूने आँगन में स्मृतियों का गुनगुनाना,
मन के बंद कपाटों का फिर खुल जाना।
नदी की हथेली पर बादल का छाना,
लहरों के अधरों पर सूरज का गाना,
रेतों पर पगचिह्नों का धीरे मिट जाना,
फिर अगली लहरों का उनको सजाना।
पीपल की छाँवों में पत्तों का बतियाना,
दीये की लौ का हवा से आँख मिलाना,
दहलीज़ पर किसी अपने की आहट पाना,
और बिना बोले ही मन का खिल जाना।
कुछ चेहरे धूप बने, कुछ बने शामियाना,
कुछ ने सिखला दिया चुप रहकर दुख छुपाना,
कुछ स्मृतियाँ बनकर भीतर तक उतर जाना,
यही तो है जीवन—निरंतर आना-जाना।
-पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X