भगवान को
भूख खा जाती है जब अक्सर ख़रे ईमान को
कोसने लगता है फिर तो आदमी भगवान को।
हम हैं छोटे जब हो जी इज़्ज़त उछाला कीजिए
फर्क आखिर क्या ही पड़ता है यहाँ धनवान को।
आज़माते सब्र हैं सरकार इतना किस लिए
सब्र भी है तोड़ता इक दिन बड़े इंसान को।
सबकी डफली राग सबका है यहाँ बिल्कुल अलग
बात आती है समझ इतनी तो हर नादान को।
आस सरकारों से आखिर क्या लगाएँ हम अनिल
कब तलक नारों से सींचेगी ये रेगिस्तान को।
- पंडित अनिल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X