कलयुग की गाथा:-
देखो–देखो कलयुग आया,
संग में अपने भ्रष्टाचार लाया।
हर गली–चौक लूट मचाया,
अपनों को अपनों से लड़वाया।
चारों भाई शत्रु बन बैठे,
बहनें रिश्तों से कट बैठीं।
स्वार्थ ने ऐसा जाल बिछाया,
ममता का आँचल भी जल पाया।
धर्म–जाति की आग लगाई,
सदियों की भाईचारा भुलवाई।
भाषा के नाम पर दीवारें खड़ी,
देश–राज्यों की एकता तोड़ी।
सच को झूठ का चोला पहनाया,
झूठ को मंच पर सिरमौर बनाया।
ईमानदारी बोझ बन गई,
बेईमानी चलन में ढल गई।
न्याय तराजू छोड़ चुका है,
सिक्कों से अब तौला जाता है।
गरीब की थाली सूनी रोई,
अमीर की तिजोरी हँसकर सोई।
मेहनत हारी, छल ने जीता,
सपनों का हर दीपक रीता।
शिक्षा बिके, विवेक भी हारे,
मूल्य सभी बाज़ार उतारे।
मंदिर–मस्जिद झगड़ते रहे,
इंसानियत के क़त्ल होते रहे।
भगवान पुकारे—“मत लड़ो”,
पर इंसान ने सुनी ही नहीं वो।
फिर भी अँधेरों में उजियारा,
अब भी बचा है थोड़ा सहारा।
हर युग में सवेरा आता है,
जब इंसान खुद को पहचानता है।
जिस दिन जागेगा मानव मन,
टूटेगा स्वार्थ का हर बंधन।
न धर्म लड़े, न जाति लड़े,
बस इंसान से इंसान जुड़े।
तब जाएगा ये कलयुग हार,
सत्य बनेगा फिर से आधार।
देखो–देखो वो युग आएगा,
जब मानवता फिर मुस्काएगा।
देखो-देखो कलयुग आया,
संग में अपने भ्रष्टाचार लाया।
जहाँ देखो जिधर भी देखो,
संस्कृति को पीछे छुड़ाया,
मानवता के मूल्यों को
पैरों तले रौंदता आया।
देखो-देखो कैसा कलयुग आया,
अहंकार ने हर दिल पर डेरा जमाया।
सच झूठ के साए में दब गया,
ईमान बिक गया, धर्म सिमट गया।
हर ओर मची है इसकी महामारी,
लालच बना बैठा है पहरेदारी।
अपनों में ही बैर बढ़ाया है,
इंसान को इंसान से लड़ाया है।
फिर भी कहीं उम्मीद की लौ जलती है,
अंधेरे में भी सच्चाई पलती है।
जब जागेगा मानव अपना धर्म निभाएगा,
तब इस कलयुग में भी
सतयुग फिर लौट आएगा।
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