बड़े-बड़े नेता देखे हैं
सुने बहुत उनके भी भाषण,
पर उनमें वह शक्ति नहीं है
जो कर ले पागल की होड़ ।
देशभक्ति का ढोल पीटते
और विकास की बीन बजाते,
पर विचलित होते हैं मग से
नहीं लग पाता है जब जोड़ ।
नेता जिस दिन शोर मचाते
पागल से ज्यादा चिल्लाते,
हार मगर जाते हैं फिर भी
हो जाता जब भंडाफोड़ ।
प्यारे तुम पागल हो जाओ
ना पागलपन का ढोंग रचाओ,
नहीं बचोगे नाटक करके
पड़ेंगे कोड़े नहीं तो कोढ़ ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
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