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किस-किस का में हाल सुनाऊं

                
                                                         
                            कोई प्रेम में कोई नेम में
                                                                 
                            
धर्म-कर्म में पागल है,
कोई पागल घूम रहा है
सारा संसार अचेतन है ।

कहां-कहां की बात बताऊं
किस-किस का में हाल सुनाऊं,
यह सारा जग देखा हमने
पागल प्रेम निकेतन है ।

तू अपने को बांध रहा है
नहीं बांध पाता कुछ है,
क्या-क्या अपना बना लिया
ना तेरा तन मन धन है ।

तुझ पर तो अनमोल खजाना
लुटा रहा है जग को,
अरे सहोदर जाग जा जल्दी
यह कैसा पागलपन है ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
42 मिनट पहले

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