कोई प्रेम में कोई नेम में
धर्म-कर्म में पागल है,
कोई पागल घूम रहा है
सारा संसार अचेतन है ।
कहां-कहां की बात बताऊं
किस-किस का में हाल सुनाऊं,
यह सारा जग देखा हमने
पागल प्रेम निकेतन है ।
तू अपने को बांध रहा है
नहीं बांध पाता कुछ है,
क्या-क्या अपना बना लिया
ना तेरा तन मन धन है ।
तुझ पर तो अनमोल खजाना
लुटा रहा है जग को,
अरे सहोदर जाग जा जल्दी
यह कैसा पागलपन है ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
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