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हमा हमीं में यह जग मिटता

                
                                                         
                            थाट फकीरा बना के
                                                                 
                            
अपना चल जंगल की ओर,
जंगल में जब मंगल होगा
नाचेगा और करेगा गान ।

एक अकेला तू आया है
आकर के यह तन पाया है,
तेरा क्या क्या है इस जग में
जिसका तू करता है दान ।

हमा हमीं में यह जग मिटता
देखें कौन यहां पर टिकता,
पर कैसा पागल है मानव
यूं ही करता झूठी शान ।

जग दो दिन का तू दो दिन का
पर चलते अलबेली चाल,
बड़ों बड़ों को भूल सहोदर
तू करता है किसका मान ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
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एक घंटा पहले

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