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नगर महानगर का चौराहा

                
                                                         
                            जान जलेबी के चक्कर में
                                                                 
                            
उसकी चाहे चली जाएगी,
पर पागल है नहीं छोड़ता
ले लेता है बिना दाम ।

नगर महानगर का चौराहा
या चाहे हो कोई गांव,
बैठा पत्थर फेंक रहा है
अरबर बकता रहा तमाम ।

दुनिया में वह सबसे अच्छा
सबसे झूठा सबसे सच्चा,
कभी हंसना कभी रोता
उसका है पागल जो नाम ।

दुनिया में तू ही तो एक है
तू ही प्यार बड़ा नेक है,
एक बार में भी तो पागल
हो जाऊं पी करके जाम ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
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एक घंटा पहले

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