जाति धर्म के भेद दृष्टि को
पागल भी क्या जाने,
अपने में है मगन हमेशा
वह नाचे और गए ।
फाड़ लंगोटी बहुत पुरानी
डंडे में बांधी है,
गाड़ के झंडा अपना फिर
जग को कुछ-कुछ समझाएं ।
नई-नई बातें बतलाता
बीच में हंसना रोता गाता,
रूठ गए गर पागल तो
कौन उन्हें समझाएं ।
जग में न्यारी चाल तेरी
नहीं काल की है परवाह ,
उलटी रीत चलाना सबको
पागल ही बतलाएं ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
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