आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अंधेरों - अंधेरों से लड़ कर रौशनी भी थकी

                
                                                         
                            अब न ख्वाहिशें बची
                                                                 
                            
अंधेरों --- अंधेरों से लड़ कर रौशनी भी थकी
किसको अपना कहें , सारी दुनियां ही
अनजानी से है लगी
छोड़ दी उम्मीदें सारी
खोने के लिए बस बाकी है
वो झूठी हसरतें जो
नाजों से थी पाली
दो पल की हंसी से ज़िंदगी ,
नहीं है गुजारी जाती
तोड़ो जो पत्थरों को अगर
टूट के रेत बन ही जाता है
झूठ -- झूठ सा ख्वाब
कब तलक , सहेज के कोई
अंखियों में है रख पाता है
आईना की बिसात अब इतनी
कहां की वो सच दिखा सकें
आखिर कौन व्यथित मन का
मौन समझे , ऐसा अपना
नज़रों को इस जहां में नज़र
नहीं आता है
अब न ख्वाहिशें बची
अंधेरों -- अंधेरों से लड़ कर रौशनी भी थकी !!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
7 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर