"ऐसा नहीं कि..."
तुम मिलो इत्तफ़ाक़न ही से सही, ऐसा ही कुछ मन में नहीं।
तुम ना आओ कभी लौटकर, ऐसा भी मन कुछ कहता नहीं।
तुम आईं तो कुछ अनकही हर एक बात कह दूँगा तुमसे,
तुम भी अपने मन की कुछ कह दो, ऐसी कोई शर्त नहीं।
ऐसा नहीं कि अब याद आती नहीं, बस उतना सताती नहीं।
तुझे भी मेरी याद कभी तड़पाए,
ऐसी मन में कोई हसरत नहीं।
तुझसे शिकायतों का कोई सिलसिला अब दरमियान नहीं,
अब तुम मान भी जाओ तो, वह पुरानी मंज़िल भी एक नहीं।
ऐसा नहीं कि अब तुमसे मेरा कुछ रिश्ता रहा ही नहीं,
दर्द हर किसी के लिए यूँ ही ख़ामोशी से सहे जाते नहीं।
तुम ना आओ कभी लौटकर, ऐसा भी मन कुछ कहता नहीं।
मन के रिश्ते का ख़ामोश सा एहसास मैंने गँवाया नहीं।
अमोल हरिदास.
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