ये पेट न होता तो,
कोई भूख न हमको सताती।
ये पेट न होता तो,
कोयलें भी दिन भर गातीं।
ना होती कोई इंक़लाब की बातें,
ना भूख से कलाकार की आत्मा मारी जाती।
होती मुँह में ज़ुबान एक,
जो सिर्फ़ जीवन में रस लाती।
ना उठानी होती उसे आवाज़ कोई,
बस दिन भर चटखारे खाती।
ये पेट न होता तो,
मर जाती सब बुराई इंसान की।
ना होते फिर ऐलान जंग के,
ना होती ज़रूरत फ़ौजों की।
बन जाता एक ऐसा जहाँ,
जिसमें होती ज़रूरत सिर्फ़ फूलों की।
ये पेट न होता तो,
कोई भूख न हमको सताती।
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