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शहरों-गाँवों से गुज़रता हूँ।

                
                                                         
                            मैं ट्रेन हूँ,
                                                                 
                            
शहरों-गाँवों से गुज़रता हूँ।
कभी पहाड़ों पर,
कभी नदियों से होकर,
फिर एक शहर ही पहुँचता हूँ।
लोग आते हैं
लोग जाते हैं
मूँगफली के छिलकों जैसे
यादें छोड़ जाते हैं।
वो तो अपनी मंज़िल पहुँचते हैं,
मैं ही हूँ जो शहर-शहर भटकता हूँ।
कभी लगता है
मैं चल नहीं रहा,
बस दुनिया ही सरक रही है
मेरे दोनों ओर से।
मैं ट्रेन हूँ—
चलता हूँ, पर पहुँचता नहीं।
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1 hour ago

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