रिवायतें आज नहीं तो कल बदलेंगी,
ये ठहरी हुई तस्वीरें भी
कभी अपना रंग बदलेंगी।
जो बदल गईं ज़माने के साथ,
वो कहावतें अब क्या कहें—
वक़्त की करवट के आगे
किसकी ज़ुबाँ ठहरती है?
ऐ साहिब!
सुनवाई का जो दौर था,
उसकी अदायगी भी अब
कुछ और रंग बदलेगी।
काला हो या गोरा—
कोई रंग अपना कहाँ होता है,
जो रंग भीतर उतर जाए,
वही तो सब पर चढ़ा रहता है।
मोहब्बत...
हाँ, शायद मोहब्बत ही का ज़िक्र है,
जो उस एक अनजान शख़्स के
लबों पर हर वक़्त थिरकता रहता है।
मैं भी उसी एक का
मुरीद होता चला गया,
उससे तो कभी कह न सका,
बस आपसे ही जाने क्यों
आज यह राज़ कह चला गया।
जो अँधेरों में बसर कर रहे थे
उम्र भर अपनी ज़िंदगी,
उजालों की जानिब
अब वे भी आ गए हैं।
कल तक जो हमें
दूर से लुभाते थे,
आज कुछ उनके अख़लाक़
हमें भी लुभा गए हैं।
यह कमनसीबी है
या खुशनसीबी अपनी—
ख़ुदा जाने!
कब, किस पर,
कौन-सी रहमत फ़िदा हो जाए उसकी।
किसी के हिस्से में
सुबह देर से आती है,
मगर आती ज़रूर है;
किसी की राह में
रात लंबी होती है,
मगर हर रात के सीने में
एक सवेरा ज़रूर है।
जो उसका करम है,
वही तो अपना है—
बाक़ी सब तो
वक़्त की लिखी हुई कहानी है।
अब तुम्हें क्या कहूँ, अमित,
यह जो दायरा क़ायम है,
शायद यही मेरी पहचान है,
यही मेरी राह,
यही मेरा विश्वास है—
कि रंग बदलते रहें ज़माने के,
हालात बदलते रहें,
लोग बदलते रहें,
मगर दिल में
मोहब्बत का दिया जलता रहे।
क्योंकि आख़िर में
सब कुछ बदल जाता है—
बस एक चीज़ रह जाती है...
उसका करम,
और उसी करम में
अपना होना।
-आचार्य अमित
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