आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बल्कि आज़ादी का अर्थ समझा है।

                
                                                         
                            आज़ादी —
                                                                 
                            

पिंजरे में रहना
पक्षियों को भी नहीं भाता,
फिर हम तो इंसान हैं—
हमें कैद कहाँ सुहाती है?

कौन है जो अपनी इच्छा से
बंधन स्वीकार करना चाहता है?
उत्तर हम सब जानते हैं—
कोई नहीं।

फिर भी…
इस संसार में एक ऐसी लंबी कतार है,
जो अपनी आज़ादी को भुलाकर
दूसरों की खुशियों की खातिर
अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर देती है।

वह अपने सपनों को
चुपचाप तह करके रख देती है,
अपनी इच्छाओं को
परिवार की ज़रूरतों के पीछे छुपा देती है,
और अपने हिस्से की धूप भी
किसी और के आँगन में बाँट देती है।

हाँ…
मैं बात कर रहा हूँ—
हमारी माँ की,
हमारी बहन की,
हमारी पत्नी की,
हमारी बेटी की,
और उस स्त्री के हर उस रूप की
जिसे हम प्रेम तो कहते हैं,
पर उसकी स्वतंत्रता को
अक्सर अनजाने ही छीन लेते हैं।

हम आज़ादी का उत्सव मनाते हैं,
तिरंगा लहराते हैं,
देशभक्ति के गीत गाते हैं—
पर क्या कभी अपने भीतर झाँककर देखा है?

ऑफिस में कुछ मिनट देर हो जाएँ,
तो हम अपने अधिकारी से
रियायत की उम्मीद रखते हैं…

लेकिन घर में
सुबह की चाय कुछ देर से मिले,
तो उसी स्त्री पर
अपना क्रोध उतारने में
एक पल भी नहीं लगाते।

वह चुप रहती है…
शायद इसलिए नहीं कि उसे दर्द नहीं होता,
बल्कि इसलिए कि
उसके प्रेम ने उसे
बहुत कुछ सहना सिखा दिया है।

उसकी आँखों में आँसू आते हैं,
और होंठों पर फिर भी
एक ही शब्द रहता है—
“माफ़ कर दीजिए…”

कितनी विचित्र विडम्बना है—
जिसे हमने जीवनभर
हमारी खुशियों का कारण माना,
उसी की आँखों में
हम कभी-कभी दुःख का कारण बन जाते हैं।

और यह तो बस
एक छोटा-सा उदाहरण है…

ऐसे अनगिनत बंधन हैं,
जिन्हें हम परम्परा,
जिम्मेदारी, प्रेम, संस्कार
या अधिकार का नाम देकर
हर दिन अनजाने में
किसी न किसी स्त्री पर थोप देते हैं।

कभी उसके पहनावे पर,
कभी उसके सपनों पर,
कभी उसके निर्णयों पर,
कभी उसकी आवाज़ पर—
और कभी केवल इसलिए
कि वह “हमारी” है।

पर याद रखिए…

कोई भी मनुष्य किसी का स्वामी नहीं।
प्रेम अधिकार नहीं—सम्मान है।
रिश्ता बंधन नहीं—विश्वास है।
और स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं—
हर आत्मा का जन्मसिद्ध अधिकार है।

इसलिए इस बार
जब हम आज़ादी का पर्व मनाएँ,
तो केवल देश को आज़ाद
होने की बधाई न दें…

अपने घर के भीतर भी
एक छोटी-सी क्रांति करें।

उसके सपनों को सुनें,
उसकी चुप्पी को समझें,
उसकी थकान को महसूस करें,
उसकी इच्छा का सम्मान करें…

और यदि आज
हमारी किसी बात से
उसकी आँखों में
एक आँसू उतर आया है—

तो उस आँसू को
गिरने से पहले ही
अपने प्रेम की हथेली पर थाम लें।

क्योंकि शायद…

देश की सीमाओं से परे
आज़ादी की सबसे पहली सीमा
हमारे अपने घर की देहरी है।

जिस दिन
हम अपने घर की स्त्री को
बिना भय, बिना अपराधबोध,
बिना किसी अनुमति के
अपने सपने जीते हुए देख सकेंगे—

उस दिन समझिएगा,
हमने केवल
आज़ादी का पर्व नहीं मनाया,
बल्कि आज़ादी का अर्थ समझा है।

और जिस दिन
किसी स्त्री की आँख का आँसू
हमारी संवेदना से
आज़ाद हो जाएगा—

उस दिन
मैं समझूँगा…

हम सचमुच
आज़ादी मनाने के
हक़दार हो गए हैं।
— आचार्य अमित
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर