मैं उसके सामने जाता तो जाता कैसे?
मैं अपने सपनों को हकीकत बनाता तो बनाता कैसे?
शहरों के मीर झुकते हैं इस फ़कीर के आगे,
मैं उसको ये बात समझाता तो समझाता कैसे?
मैं अपनी मुफ़लिसी का साथी उसको बनाता तो बनाता कैसे?
मैं उसके सामने जाता तो जाता कैसे?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X