आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब

                
                                                         
                            आज न जाने कितने दिनों बाद ये सवाल आया है,
                                                                 
                            
गुज़रते वक़्त को देखकर ये ख़याल आया है।

ऐ दोस्त,
एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब,
न जाने किधर जाएँगे हम सब।
एक-दूसरे को याद बहुत आएँगे हम सब,
शायद याद करके थोड़ा तो मुस्कुराएँगे हम सब।

एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब,
एक-दूसरे को याद बहुत आएँगे हम सब।

जब कभी ग़म में डूब जाएँगे हम सब,
एक-दूसरे को फ़ोन मिलाएँगे हम सब।

एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब,
एक-दूसरे को याद बहुत आएँगे हम सब।

अपनी ये कहानियाँ
अपने हमसफ़र को सुनाएँगे हम सब,
एक-दूसरे को याद करके
कोई गीत गुनगुनाएँगे हम सब।

एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब,
अपनी नादानियों की कहानी
अपने बच्चों को सुनाएँगे हम सब।

एक रोज़ बिछड़ जाएँगे हम सब,
एक-दूसरे को याद बहुत आएँगे हम सब।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
16 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर