सम्बंधों को आओ थोड़ी धूप दिखाएं
संकोचों की सँकरी दीवारों के मारे
जीते जग से किंतु स्वयं से हारे हारे
सुविधाओं के महलों में ये पसरे पसरे
सील गये हैं सुंदर रिश्ते नाते सारे
इनको इनके यौवन वाला रूप दिखायें
सम्बन्धों को आओ थोड़ी धूप दिखायें !
मन के हर एक कोने में सौ सौ जाले हैं
बंदी रोशनदानों ने हँसकर पाले हैं
काले काले धुंये भरे हैं सीनों में भी
और अधरों के दरवज्जों पर ताले हैं
खारा खारा जीवन सारा होता जाता
मीठा मीठा इसको आओ कूप दिखायें
सील गये हैं सुंदर रिश्ते नाते सारे
सम्बन्धों को आओ थोड़ी धूप दिखायें !
माना गहरी कहीं चुभीं हैं कड़वी मातें
माना पग को रोक रहीं हैं बीती बातें
माना मुस्कानों ने लूटा है जी भर के
माना छलनी जिगर हुआ है पाकर घातें
चाक जिगर को सिएं समय की हम सुईयों से
हुनर जमाने को अपना यह खूब दिखायें !
बाँचे हमने ग्रन्थ बहुत अब आँखें बाँचें
उन आँखों में खुद को पाकर झूमें नाचें
खाते बहियाँ टाँची हमने नकदी टाँची
नई तिजोरी में अब हम ये नाते टाँचें
गहें सुदामा अपने , अपने कृष्ण गहें हम
दरकी आस को द्वारिका के भूप दिखायें !
माना गोमुख दूर बहुत है कठिन डगर है
और संकल्पों में तेरे भी अगर मगर है
नयन नीर से धो ले पगले कालिख सारी
तेरी आँखों का जल भी तो गंगाजल है ,
पश्चातापों को तापें सब गलन गलायें
खुद को खुद के अंदर का स्तूप दिखायें !
गंगा जमुनी तहजीबों पर नमीं पड़ी है
घाट घाट पर गहरी काई जमीं पड़ी है
खुरपी वाले हाथ न जाने कहाँ खो गये
भाईचारे की अब साँसें थमीं पड़ीं हैं
कंकर पत्थर जमा हो गये व्यवहारों में
कबीरा वाला आओ इनको सूप दिखायें
सील गये हैं सुंदर रिश्ते नाते सारे
सम्बन्धों को आओ थोड़ी धूप दिखायें !
आलोकेश्वर चबडाल
दिबियापुर ।
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