तुम दुर्योधन तो कर्ण हूँ मैं,
तुम रावण तो कुंभकर्ण हूँ मैं।
जो साथ रहे सच दिखलाए,
एक ऐसा दर्पण हूँ मैं।
मित्र, सखा, सहचर हूँ मैं,
तुम शब्द बनो तो अक्षर हूँ मैं।
तुम्हें उड़ना हैं तो पर हूँ मैं,
कोई टकराए तो पत्थर हूँ मैं।
तुम पास तो मानो हरियाली,
तुम नही तो फिर बंजर हूँ मैं।
कोई दुश्मन तुमको आँखें दिखाए,
उसकी आँखों का डर हूँ मैं।
साथ हमेशा रहूँगा मैं जैसे रहती परछाई हैं,
खून भले ही एक नहीं हैं, पर तू मेरा भाई हैं।
-आलोक शर्मा
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