किसी के नाम पर मुझको चिढ़ाना, मेरी नाराज़गी पर मुझको हंसाना।
कभी मुझे जानने को पास आना, कभी अनायास गुस्सा दिखाना.
कभी मेरी बातों में ही डूब जाना, कभी बेवज़ह मुझसे ऊब जाना।
कभी भविष्य की गहरी आँखों में झकना, कभी मेरे भूत की हालात तकना
कभी मेरे शिक्षा की सीमा आंकना, कभी मेरे सपनों का पता तलाशना।
कभी मेरे कपड़ो की तारीफ करना,कभी मेरे बालों पर जोर जोर से हंसना.
कभी मेरी बातों की नकल उतारना, कभी मेरे शब्दों को हटकर बताना।
दोनों के बीच तपते रेगिस्तान का बनना, और फिर नंगे पांव दोनों का उसको पार करना।
अलग-अलग ओर दोनों की राहों का झुकना, ना तो कोई उधारी ना ही कोई वादा रखना .
क्या कहूं इस रिश्ते को दोस्ती से कहीं कम ,या फिर दोस्ती से कहीं ज्यादा।
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