हर तरफ तो धूप है ,
छाया किस्से लूं ?
इस अनजान शहर में
किस पर यकीन करूँ ?
निकल पड़ी हूं घर से,
मंजिल की तलाश में ,
रास्ता पूछो भी तो ,
यहाँ किस्से पूछो ?
आजकल इंसानों जैसे ,
ही शैतान घूमते है ,
इस विचित्र शहर में ,
अपना किसे कहू ?
- आकांक्षा चतुर्वेदी
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