आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

विप्र सुदामा

                
                                                         
                            सुदामा को मांगे भीख नहीं,
                                                                 
                            
घर में जलता चूल्हा नहीं।
सुदामा अभी भी धैर्य बनाये,
नींद किसी को आती नहीं।।

सुशीला का धैर्य था टूट गया,
बार बार याद दिलावहिं सुदामा।
कान्हा बचपन के मीत तुम्हारे,
द्वारिका के राजा कान्हा तुम्हारे।।

जाओ द्वारिका ,जाओ द्वारिका,
बस एक की रट वह लगाने लगी।
सुदामा कहैं प्रिये कान्हा हैं राजा,
हम हैं भिखारी जाने में लाजा।।

कहाँ राजा कहाँ एक भिखारी,
प्रिये कान्हा से कैसे समता हमारी।
हम नाहीं जैहैं द्वारिकापुरी,
भीख मांग गुजारा आपन नगरी।।

Poet : Asharfi Lal Mishra , Akbarpur, Kanpur.


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर